संपादकीय

नए भारत के राष्ट्रपति

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रामनाथ कोविंद ने ससंद के संयुक्त सत्र को सबोधित करते हुए सरकार के पांच साल का जो खाका प्रस्तुत किया हैं, उसे पिछले पांच साल के उसके कामकाज की निरंतरता में देखा जा सकता है। पिछली यूपीए सरकार के दो कार्यकाल के बाद प्रधानमंत्री मोदी की अगुआई में एनडीए सरकार को लगातार दूसरा कार्यकाल  मिला हैं। ऐसे में उसके पास यह अवसर है कि वह पिछले कार्यकाल के अपने अधूरे कार्यों को पूरा कर सके।

पिछले कार्यकाल में मोदी सरकार ने काले धन और आंतकवाद के मुद्दे पर खास जोर दिया था, लेकिन कार्यकाल के आखिर में जाकर ही लोकपाल की नियुक्ति हो सकी थी। राष्ट्रपति ने काले धन और आर्थिक अपराध पर अंकुश लगाने के लिए रेरा एक्ट और आर्थिक अपराध अधिनियम का जिक्र करते हुए रेखांकित किया है कि इनके कारण काले धन और आर्थिक अपराधों को नियंत्रित करने में मदद मिली हैं।

इसमें संदेह नहीं कि इसी की वजह से विजय माल्या, मेहुल चौकसी और नीरव मोदी जैसे भगोड़े आर्थिक अपराधियों पर भी शिंकजा कसा है। प्रधानमंत्री मोदी ने देश को पचास अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की बात पहले ही कही है, जिसे राष्ट्रपति ने भी अपने अभिभाषण का हिस्सा बनाते हुए एक अहम बात की है कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूती तभी मिल सकती है, जब ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो। सरकार ने इसके लिए किसानों को सालाना छह हजार रुपये की सीधी मदद देना शुरु भी कर दिया है, और 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है।

इस कार्यकाल में सरकार को ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निवेश के नए रास्ते तलाशने होंगे, जबकि अभी ग्रामीण भारत में खपत को बढ़ाना सबसे बड़ी चुनौती हैं। वहीं ग्रामीण ही नहीं, पूरे भारत में जल संकट एक बड़ी चुनौती है, जिसकी ओर राष्ट्रपति ने ध्यान खींचा है और रेखांकित किया है कि यह सरकार की प्रथामिकता में है, जैसा कि उसने जल शक्ति मंत्रालय की स्थापना कर दिखाया भी है। राष्ट्रपति ने जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव खत्म किए जाने की बात की है।

उनके ये शब्द महज औपचारिक न रह जाएं, यह सुनिश्चित करने की सर्वाधिक जिम्मेदारी सरकार की ही है। उन्होंने सहकारी सघंवाद की बात भी की हैं, मजबूत, सुरक्षित और समावेशी भारत के निर्माण में इसके खास मायने हैं; यह सरकार को देखना होगा कि इसके अक्षरश: पालन किस तरह से हो।

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