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राफेल है या उलझन

बीबीसी खबर

राफेल सौदे के जुड़े खुलासों और बयानों के आधार पर मोदी सरकार और कांग्रेस अध्यक्ष के बीच जिस तरह के आरोप-प्रत्यारोपण सामने आ रहे हैं वह ना सिर्फ गैरजरूरी हैं ,बल्कि इनसे जरूरी मुद्दों से ध्यान भी भटकता है। पूर्व फ्रेंच राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के स्वीकारोक्ति के बाद में उन्होंने कहा था कि फ्रेंच कंपनी दसॉल्ट के सामने भारत सरकार ने रिलायंस का नाम प्रस्तावित किया था,तो जवाब में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को निशाना बनाया , वह अगर अशोभनीय था तो  जवाब में केंद्रीय मंत्रियों की ओर से जिस तरह के जवाब दिए गए, वह भी उतने ही अवांछनीय  थे। राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का व्यक्तिगत हमलों में बदल जाना वाकई बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है । बाद में ओलांद ने ना केवल सुर बदल लिए, बल्कि दसॉल्ट और फ्रेंच सरकार ने भी ओलांद के खुलासे का खंडन किया। उदाहरण के लिए ,जहां दसॉल्ट ने यह कहा कि उसने खुद रिलायंस को अपना ऑफसेट पार्टनर चुना , वही वहां की सरकार ने स्पष्ट किया कि दो कंपनियों के सौदे में सरकारों की कोई भूमिका नहीं है ।बेसक विपक्ष को सरकार से सवाल करने का पूरा अधिकार है ,लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में बगैर ठोस सबूतों के आरोप लगाने से उसे बचना चाहिए ।अलबत्ता राफेल मामले में सरकार ने भी बहुत संतुलित का परिचय नहीं दिया है। उसने अब तक सिर्फ आरोपों का जवाब देने तक खुद को सीमित रखा है। यह बिल्कुल हो सकता है कि मामले में कोई घोटाला नहीं हुआ हो और कांग्रेस इस मामले में व्यर्थ ही देश को गुमराह कर रही हो , सरकार को इस मामले में पूरी सच्चाई सामने रखने में कतराना नहीं चाहिए । इसके लिए यह भी जरूरी है कि आरोप-प्रत्यारोप के बीच कुछ ऐसे सवाल भी सामने आए हैं ,जिनके जवाब ना देना एनडीए सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी छवि के अनुकूल नहीं । फिर सवाल केवल भ्रष्टाचार का नहीं है ,बल्कि छवि का भी है । इस सरकार ने पिछले करीब साढे 4 साल में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद-विरोधी अपनी जो छवि बनाई है , चुनावी वर्ष में उसे निशाना बनाने का अवसर उसे विपक्ष को कतई नहीं देना चाहिए। इसलिए राफेल मामले में उसे पूरे तथ्यों और सबूतों के साथ सामने आना चाहिए ,ताकि धुंध हटे और देश ये जाने कि राफेल सौदे में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है ।

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