राइट टू रिकॉल और वर्तमान परिवेश में भारतीय संविधान की प्रसंगीता पर किया गया जन जागरूक

वर्तमान संवैधानिक और राजनीतिक व्यवस्था में राइट टू रिकॉल ही एकमात्र ऐसा रास्ता है जो इस अव्यवस्था पर एक बहुत बड़ा अंकुश लगा सकता है । राइट टू रिकॉल न केवल उनके मन में निश्चित कार्यावधि के दौरान उनको वापस बुलाए जाने का भय पैदा करेगा बल्कि उनको समाज के प्रति उत्तरदाई भी बनायेगा।

वर्तमान परिपेक्ष्य में राईट टू रिकॉल की प्रासंगिकता

राजनीतिक व्यवस्था एवं राजनेताओं की जुगलबंदी का परिणाम है कि आज लोकतंत्र लोक का तंत्र न होकर तंत्र का गुलाम बनता जा रहा है। एक तरफ जहां समाज व्यक्ति को अनुशासित करने के लिए एक व्यवस्था निर्धारित करता है वहीं दूसरी तरफ संविधान व्यक्तियों को नियंत्रित करना दूसरा समाज को नाबालिग मानकर तंत्र ने स्वयं को समाज का संरक्षक बना रखा हैं तथा इस बात का कहीं कोई जिक्र अथवा प्रावधान नहीं किया गया है कि समाज को कब और किस आधार पर एवं किन परीक्षणों के पश्चात बालिग माना जायेगा।

तीसरा जनप्रतिनिधियों को निर्वाचित करने का अधिकार तो जनता को दिया गया है परंतु उन पर नियंत्रण रखने में जनता की भूमिका कतई नहीं है ।

इन तीनों प्रावधानों की आड़ लेकर के भारत की राजनीतिक व्यवस्था ने समाज को पूरी तरह से अपनी कठपुतली बना रखा है और  तंत्र उसमें भी खासकर संसद अपने शक्ति विस्तार की छीना-झपटी में लगा हुआ है। इस बात को कहने में कोई संकोच नहीं है कि निर्वाचन के समय संसद में पहुंचने के लिये हर तरीके से अनैतिक संसाधनों का जबरदस्त प्रयोग किया जा रहा है। पैसा ,लोभ, लालच, शराब, पावर ,धूर्तता, बलप्रयोग और हत्या करवाने तक का आश्रय लिया जाने लगा है। इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण आये दिन देश के किसी न किसी कोने में होने वाली राजनीतिक हत्या के रूप में देखा जा सकता है ।बेशक ये हत्याये संसदीय चुनाव के परिणाम हो या फिर ग्राम पंचायतों के चुनाव परिणाम हो।

 

रिपोर्ट जितेंद्र यादव

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